वैदिक गणित का महत्व

गणितीय समस्याओं का हल ज्ञात करने में जब वैदिक गणितीय सूत्रों का निरन्तर मौखिक अभ्यास किया जाता है
तो मानव की एकाग्रता और स्मृति का विकास होता है और उसके चिन्तन-मनन में प्रखरता आती है। वैदिक गणित की सरलता, सरसता और रोचकता के कारण मानव मन में जिज्ञासा का भाव उत्पन्न होता है। जिज्ञासा उसे जागरूक बनाती है तथा शनैः शनैः उसकी अन्तः चेतना जाग्रत होने लगती है। वास्तव में वैदिक गणित इसी अन्तः चेतना के जाग्रत करने की विधा है। यही अन्तः चेतना मानव के व्यक्तित्व और मस्तिष्कके विकास का आधार बनती है।

1. मूल संक्रियाओं का अभ्यास एवं विस्तार


1.1 - योग संक्रिया

पिछली कक्षा में हमने सूत्र एकाधिकेन पूर्वेण द्वारा पूर्ण संख्याओं का योग ज्ञात करने का अभ्यास किया था। अभ्यास में पूर्ण संख्याओं और मापन-इकाई दूरी (किमी. मी.) के प्रश्न लिये थे। वास्तव में सूत्र एकाधिकेन पूर्वेण द्वारा योग संक्रिया के सभी प्रकार के प्रश्न किये जा सकते हैं जैसे मापन इकाई मुद्रा (रुपये-पैसे), तौल (किग्रा.-ग्राम), धारिता (लीटर-मि.लीटर), समय (घंटा, मिनट, सैकण्ड), दशमलव भिन्न, पूर्ण संख्या और दूरी (किमी.-मी.-सेमी.) आदि।

1.2 - मौखिक योग संक्रिया (सूत्र एकाधिकेन पूर्वेण + शून्यान्त संख्या प्रयोग)

अल्प अभ्यास से उपरोक्त सूत्र-प्रयोग आधारित विधि के द्वारा बड़ी-बड़ी संख्याओं का योग द्रुत गति से मौखिक ज्ञात किया जासकता है। शून्यान्त संख्या प्रयोग भारतीय प्राचीन गणित की एक विशेष विधि है जो बड़ी सरल तथा योग संक्रिया में प्रभावी है। इस विधिमें इकाई-दहाई दो-दो अंकों की संख्याओं का विशेष प्रकार से योग किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर तीन-तीन अंकों(इकाई-दहाई-सैकड़ा) वाली संख्याओं का योग भी किया जा सकता है। विधि :-  दो संख्याओं में से एक संख्या को शून्यान्त बनाइए। इसकी न्यूनता को दूसरी संख्या से पूरा कीजिए। दोनों नई संख्याओं को जोड़िये। प्राप्त योगफल यदि 100 से अधिक हो तो निश्चित पूर्व अंक पर एकाधिक चिह्न लगाइये। शेषफल को अगली संख्या में जोड़िये। अन्त में अन्तिम शेषफल को उत्तर के स्थान पर लिखिए। अगले दो स्तम्भों में उपरोक्त क्रिया की आवृत्ति कीजिए।

1.3 - व्यवकलन क्रिया


पिछली कक्षा में हमने व्यवकलन क्रिया की दो वैदिक विधियों का अध्ययन किया था।

  1. सूत्र एकाधिकेन पूर्वेण परम मित्र अंक आधारित विधि
  2. सूत्र एक न्यूनेन पूर्वेण परम मित्र अंक आधारित विधि

प्रथम विधि द्वारा व्यवकलन संक्रिया का मापन इकाई अथवा पूर्ण संख्या का प्रत्येक प्रश्न हल किया जा सकता है।
अतः इसी विधि पर पुनः विचार किया जा रहा है। हमें ज्ञात है कि दो अंक एक दूसरे के परममित्र अंक होते हैं यदि उनका योग दस होता है तथा वियोज्य वह संख्या है कि जिसमें से कोई संख्या घटायी जाती है और घटायी जाने वाली संख्या वियोजक कहलाती है।

1.4 - गुणन संक्रिया विस्तारः (सूत्र ऊर्ध्व तिर्यक । विनकुलम प्रयोग)

बड़े-बड़े अंकों की दो संख्याओं का गुणनफल सूत्र ऊर्ध्वतिर्यक एवं विनकुलम प्रयोग द्वारा सरलता से प्राप्त किया जा सकता है। विनकुलम प्रयोग निखिलम् विधि) से 5 से बड़े अंकों की संख्या को छोटे अंकों (0,1,2,3,4,5) की संख्या में बदल कर सूत्र ऊर्ध्वतिर्यक से गुणा किया जाता है तथा अन्त में प्राप्त ऋणांक युक्त गुणनफल को फिर से सामान्य संख्या में बदल दिया जाता है। 

1.5 संक्रिया विधि (ध्वंजाक विधि)

जब भाजक में 5 से बड़े अंक होते हैं तथा आधार 10 या 10 की घात (उपाधार नहीं) के सापेक्ष भाजक की पूरक संख्या ज्ञात हो सकती है। तब ही सूत्र निखिलम आधारित भाग की विधि प्रभावी होती है। इस विधि में मुख्य क्रिया भाजक की पूरक संख्या द्वारा ही होती है। यदि भाजक में 5 से छोटे अंक होते हैं अथवा लाये जा सकते हैं तथा बांयी ओर से भी अंक 1 होता है अथवा लाया जा सकता है और आधार = 10 या 10 की घात (उपाघार नहीं) के सापेक्ष भाजक का विचलन ज्ञात किया जा सकता है। तब ही सूत्र परावर्त्य योजयेत आधारित भाग की विधि प्रभावी होती है। तीनों विधियों में से केवल यही भाग की विधि बीजगणित में प्रयोग में लायी जाती है। सूत्र ऊर्ध्वतिर्यक आधारित ध्वजांक विधि द्वारा भाग संक्रिया का प्रत्येक प्रश्न हल किया जा सकता है। इस विधि में किसी भी भाजक के मुख्यांक तथा ध्वजांक का चयन बड़ा महत्वपूर्ण है। ध्वजांक कितने भी अंकों का हो सकता है। मुख्यांक में भी अनेक अंक हो सकते हैं यदि उसका भाग भाज्य-संशोधित भाज्य में सरलता से जाता है। ध्वजांक में जितने अंक हैं उतने ही इकाई की तरफ से भाज्य के अंक तृतीय खण्ड में तथा शेष अंक मध्य खण्ड में रखे जाने चाहिये। 
RBSE 10th - वैदिक गणित  राजस्थान बोर्ड Ram Education Group