1.04 - वर्ग संक्रिया

वर्ग एक विशेष गुणन संक्रिया है कि जिसमें एक संख्या का उसी संख्या से एक बार गुणा होता है
वर्ग, गुणन संक्रिया के जिस सूत्र का छात्र को अच्छा अभ्यास हो, उसी सूत्र से वह किसी भी संख्या का वर्ग ज्ञात कर सकता है।
वर्ग संक्रिया निम्न सूत्र-उपसूत्रों द्वारा सम्पन्न की जा सकती है।
  1. सूत्र एकाधिकेन पूर्वण
  2. उपसूत्र आनुरुप्येण
  3. सूत्र निखिलम् (आधार-उपाधार) अथवा यावदूनम् तावदूनी कृत्य वर्ग च योजयेत्
  4. सूत्र ऊर्ध्वतिर्यक (द्वन्द्वयोग विधि)
  5. सूत्र संकलन-व्यवकलन (इष्ट संख्या विधि)
RBSE Class 10th प्रश्नावली 1.2 वैदिक गणित - वर्ग संक्रिया, घनफल संक्रिया
RBSE Class 10th प्रश्नावली 1.2 वैदिक गणित - वर्ग संक्रिया, घनफल संक्रिया


उपरोक्त सूत्र-उपसूत्रों में से पिछली कक्षा में हमने सूत्र निखिलम्-आधार तथा सूत्र निखिलम् -उपाधार तथा सूत्र ऊ तिर्यक आधारित विधियों का विस्तार से अध्ययन किया है।

यावदूनम तावूदनी कृत्य वर्ग च योजयेत् सूत्र निखिलम का ही एक उपसूत्र है जो किसी आधार अथवा उपाधार के निकट की संख्याओं का वर्ग ज्ञात करने के काम आता है।

सूत्र ऊर्ध्वतिर्यक आधारित द्वन्द्वयोग विधि द्वारा किसी भी संख्या का वर्ग ज्ञात किया जा सकता है।

1 - सूत्र एकाधिकेन पूर्वेण


सूत्र एकाधिकेन पूर्वेण आधारित विवि उन्हीं संख्याओं का वर्ग ज्ञात कर सकती है, जिनका इकाई अंक या चरमंअंक 5 होता है।
वर्ग ज्ञात करने में इस सूत्र का प्रयोग सीमित है।

2 - उपसूत्र आनुरुप्येण


उपसूत्र आनुरुप्येण का अर्थ समानुपात अथवा अनुरूपता द्वारा 1 उपसूत्र द्वारा दो अंकों की संख्या का वर्ग ज्ञात करना ही सुविधाजनक होता है।
विधि को उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है।

3 - उपसूत्र यावदूनम् तावदूनी कृत्य वर्ग च योजयेत्


उपसूत्र यावदूनम् तावदूनी कृत्य वर्ग च योजयेत् का अर्थ है कि आधार अथवा उपाधार के सापेक्ष किसी संख्या में जो न्यूनता अथवा अधिकता हो,उस न्यूनता अथवा अधिकता को उस संख्या में से कम-अधिक कर उसमें उसका वर्ग जोड़ दीजिए। न्यूनता अथवा अधिकता को विचलन भी कहा जाता है।
विचलन = संख्या-आधार अथवा उपाधार

4 - सूत्र ऊर्वतिर्यक आधारित द्वन्द्वयोग विधि

सूत्र ऊर्वतिर्यक आधारित द्वन्द्वयोग विधि से कितने भी अंकों की संख्या का वर्ग सरलता से ज्ञात किया जा सकता है। सूत्र ऊर्ध्वतिर्यक द्वारा दो संख्याओं के गुणन में समूह के अनुसार जो गुणनफल प्राप्त होता है, वहीं द्वन्द्वर

5 - इष्ट संख्या विधि

इष्ट संख्या विधि यदि संख्या तथा इष्ट संख्या हो तो (x+a)(x-a)+a सूत्र द्वारा किसी भी संख्या का वर्ग
ज्ञात किया जा सकता है।
भास्कराचार्य द्वितीय रचित 'लीलावती में किसी संख्या का वर्ग ज्ञात करने की इस विधि को 'इष्ट संख्या विधि का नाम दिया गया है।
वैदिक गणित में यह विधि सूत्र संकलन-व्यवकलन आधारित विधि भी मानी जाती है। जब संख्या में इष्ट संख्या जोड़ने या घटाने से एक शून्यान्त संख्या प्राप्त होती है

तब यह विधि अधिक, प्रभावी होती है तथा उपसूत्र यावदूनम् तावदूनी कृत्य वर्ग च योजयेत् का रूप ले लेती है। विधि को निम्न उदाहरणों से स्पष्ट किया जा रहा है।

1.05 घनफल संक्रिया


वैदिक गणित में किसी संख्या का घनफल ज्ञात करने की सरल एवं महत्वपूर्ण विधियों निम्न सूत्र-उपसूत्र आधारित हैं।

  • (1) सूत्र निखिलम (आधार-उपाचार)
  • (2) सूत्र एकाधिकेन पूर्वेण
  • (3) उपसूत्र आनुरुप्येण

(1) सूत्र निखिलम् (आधार-उपाधार)


पिछली कक्षा में सूत्र निखिलम आधारित विधियों द्वारा आधार अथवा उपाधार के निकट की संख्याओं का घनफल ज्ञात करना सिखाया गया था।

इन विधियों को उपसूत्र "यावदूनम् तावदूनी" आधारित विधियाँ भी कहते हैं।
आधार विधि इस विधि में गुणन संक्रिया के तीन खण्ड किये जाते हैं।

बांयी तरफ से प्रथम खण्ड में संख्या विचलन का दुगना लिखा जाता है।

मध्य खण्ड में विचलन के वर्ग में तीन का गुणा किया जाता है। तृतीय खण्ड में विचलन का घन लिखा जाता है।

मध्य व तृतीय खण्ड में आधार के सापेक्ष अंक संख्या रखी जाती है जैसे आधार 10 हो तो एक-एक अंक अथवा आधार 100 हो तो दो-दो अंक।
तीनों खण्डों को एक साथ लेने पर प्राप्त सूत्र
घनफल = संख्या + (विचलन)x2/3x(विचलन)/(विचलन)
जबकि विचलन संख्या आधार अथवा उपाधार

उपाघार विधि आधार विधि के समान इस विधि में भी गुणन संक्रिया के तीन खण्ड होते हैं।
(1) प्रथम खण्ड = (उपाधार अंक) (संख्या + विचलन x2)
(2) मध्य खण्ड = उपाधार अंक x3x (विचलन)
तृतीय खण्ड = (विचलन)
(4) आधार में जितने शून्य, उतने ही अंक मध्य एवं तृतीय खण्ड में रखे जाते हैं।
विधि को निम्न उदाहरणों से स्पष्ट किया जा रहा है।

(2) सूत्र एकाधिकेन पूर्वणः


सूत्र द्वारा दो अंकों की किसी भी संख्या का घनफल ज्ञात किया जा सकता है।
विधिःगुणन संक्रिया को चार खण्डों में लिखिए।
बांये से प्रथम खण्ड दहाई अंक का वर्ग x उसका एकाधिक
द्वितीय खण्ड दहाई अंक का वर्ग x विचलन
तृतीय खण्ड = 3x दहाई अंक x (इकाई अंक)
चतुर्थ खण्ड जहाँ विचलन = इकाई अंक x3-10

उपसूत्र आनुरुप्येण का अर्थ है अनुरूपता अथवा समानुपात द्वारा। घनफल संक्रिया में चार खण्ड होते हैं। उपसूत्र के अनुसार

(3) उपसूत्र आनुरुप्येण:


प्रथम तथा द्वितीय खण्ड में लिखी संख्याओं का वही अनुपात होता है जो द्वितीय तथा तृतीय खण्ड में लिखी संख्याओं का। तृतीय और
चतुर्थ खण्ड के लिये भी यही अनुपात सत्य होता है। खण्डों में संख्याएं विधि अनुसार लिखें।
विधिः 1. उत्तर के लिए चार खण्ड बनाइए।

  1. बाँयी ओर से प्रथम खण्ड में संख्या के दहाई अंक का घन तथा चतुर्थ खण्ड में संख्या के इकाई अंक का घन लिखें।
  2. दूसरे खण्ड में दहाई अंक का वर्ग इकाई अंक लिखें।
  3. तीसरे खण्ड में दहाई अंक इकाई अंक का वर्ग लिखें।
  4. दूसरे एवं तीसरे खण्ड में प्राप्त गुणनफल का दुगना उन्हीं खण्डों में और जोडिए।
  5. द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थखण्ड में एक-एक अंक रहेगा। सबका योगफल ही अभीष्ट घनफल है।