अंकगणित

अंकगणित की मूलभूत प्रमेय पूर्व में हम प्राइमरी कक्षाओं में भाज्य एवं अभाज्य संख्याओं के बारे में पढ़ चुके हैं। 

हम जानते हैं कि कोई धनात्मक अभाज्य संख्या केवल 1 या फिर स्वयं से ही भाजक है। 

अब हम किसी धनात्मक पूर्णाक के बारे में विचार करते हैं एवं उसे गुणनखण्ड रूप में व्यक्त करते है. उदाहरणार्थ

5313 = 3x7x11x23

या 140 = 4x5x7

इत्यादि।

उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि प्रत्येक गुणनखंड या तो एक अभाज्य पूर्णांक होगा या एक भाज्य पूर्णांक होगा यदि कोई गुणनखंड अभाज्य पूर्णांक है तो इसे आगे भी गुणनखण्ड कर सकते हैं जब तक कि सभी गुणन खण्ड अभाज्य प्राप्त नहीं हो जाते।

उदाहरणार्थ 140 के अन्ततः गुणनखंड इस प्रकार होंगे।

उदाहरण में पूर्णांक 8190 के गुणन खण्ड बिना यह ध्यान दिये कि अभाज्य संख्याएँ किस क्रम में आ रही है, किये गये हैं। 
अतः स्पष्ट है कि एक धनात्मक पूर्णांक का अभाज्य गुणनखण्ड, उसके गुणन खण्डों के क्रम पर निर्भर नहीं है 
अतः किसी भाज्य संख्या को अभाज्य संख्याओं के अद्वितिय प्रकार से गुणनखण्डन रूप में लिखा जा सकता है अर्थात् अभाज्य गुणन खण्डन अद्वितिय (unique) होता है।

यदि हम गुणन खण्डों को आरोही क्रम में लिखे एवं समान अभाज्य संख्याओं को एक साथ घात रूप में लिखे तब उपर्युक्त संख्या 8190 के लिए निम्न अनुसार या कन्जक्चसर (conjecture) प्राप्त होता है.

8190 = 2x3 x5 x7x13

अंक गणित की यही अवधारणा आधार भूत प्रमेय या मूलभूत प्रमेय कहलाती है। 
इस तथ्य को औपचारिक रूप से निम्न कथन द्वारा

व्यक्त किया जा सकता है।

अंकगणित की मूलभूत प्रमेय


प्रत्येक अभाज्य संख्या को अभाज्य संख्याओं के एक गुणन फलन के रूप में व्यक्त (गुणन खंडित) किया जा सकता है तथा यह गुणन खण्डन अभाज्य गुणन खण्डों के आने वाले क्रम के बिना अद्वितीय होता है।

 संख्याओं की अपरिमेयता के प्रमाण


इनके स्थान निर्धारण के बारे में भी पढ़ा है। अपरिमेय संख्यायें व्यापक रूप में p द्वारा व्यक्त की जाती है, जहाँp एक धनात्मक अभाज्य

संख्या है। हम जानते है कि किसी अपरिमेय संख्या कोp/रूप में नहीं लिखा जा सकता। यहाँp एवं पूर्णाक है तथा 40 है।

उदाहरणार्थः 2, 3. 5. 7-/5 इत्यादि अपरिमेय संख्या है।

पिछली कक्षा में अपरिमेय संख्याओं के गुण धर्मों के बारे में भी पढ़ा है कि अपरिमेय संख्या का किसी परिमेय संख्या के साथ योग या अन्तर भी एक अपरिमेय संख्या ही प्राप्त होती है। यह भी सत्य है कि एक अशून्य परिमेय संख्या एवं अपरिमेय संख्या के गुणनफल एवं भागफल भी एक अपरिमेय संख्या ही प्राप्त होती है।

यहाँ हम 2, 3 एवं 5 संख्याओं की अपरिमेयता के प्रमाण स्थापित करेंगे अर्थात् इन संख्याओं को अपरिमेय संख्या सिद्ध करेंगे। हम विरोधामास विधि (proof by contradiction) एवं निम्नलिखित प्रमेय का उपयोग इन संख्याओं की अपरिमेयता सिद्ध करने में करेंगे।