प्रस्तावना

प्रकृति में हम अपने आस-पास की कई वस्तुओं को उनके एक निश्चित ढंग में दिखने के कारण पहचानते है ये वस्तुऐं अपने निश्चित प्रतिरूप का अनुसरण करती है।
जैसे मधुमक्खी के छत्ते में छिद्रों का बनना। इस प्रकार के निश्चित प्रतिरूप को प्रदर्शित करता है।

घर या दुकानों में लगी स्टील की सीढ़ी में भी एक निश्चित लम्बाई की पाइप रोड एक निश्चित अन्तराल पर लगी होती है।
गणितीय भाषा में हम कहेंगे कि प्रतिरूपों में एक नियत मात्रा में संख्या बढ़ती या घटती चली जाती है। एवं एक के बाद दूसरे, तीसरे, चौथे क्रमों में परस्पर एक निश्चित सम्बन्ध होता है।
संख्याओं के एक निश्चित नियमानुसार क्रम को अनुक्रम (Sequence) कहते हैं।

समान्तर श्रेढी

उपरोक्त अनुक्रमों में प्रथम पद छोड़कर सभी पद एक निश्चित संख्या (धनात्मक या ऋणात्मक) को पिछले पद वाली संख्या में जोड़ कर प्राप्त किये जा सकते हैं।
इस प्रकार उक्त अनुक्रमों में संख्याऐ समान्तर श्रेढी (Arithmetic progression) में लिखी हुई है।
अतः समान्तर श्रेढ़ी में अनुक्रम के प्रत्येक पद और उसके पूर्ववर्ती पद का अन्तर हमेशा समान रहता है।
यह निश्चित संख्या (अन्तर) समान्तर श्रेढ़ी का सार्वअन्तर (Common difference) कहलाता है।

समान्तर श्रेढी के प्रथम पदों का योग


  • इस अनुच्छेद में हम समान्तर श्रेढी के योग का सूत्र प्राप्त करेंगे। 
  • इसकी आवश्यकता को समझने हेतु हम एक उदारहण लेते है। 
  • लता को जन्म दिन पर उसकी माँ 500 रु देती है
  •  दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवे जन्मदिवस पर क्रमशः 600700800900 रुपये माँ ने लता को दिये। 
  • यही क्रम उसके 18 वर्ष की उम्र तक चलता है. तो 18 वें जन्म दिन पर उसके पास एकत्र राशि की गणना सभी जन्मदिनों पर प्राप्त राशि को जोड़कर निकाली जा सकेगी, 
  • जो कि एक श्रमसाध्य प्रक्रिया है चूकि 500600700800 संख्याएँ समान्तर श्रेढी में है 
  • अत इस प्रकार प्राप्त 18 पदों को जोड़ने के लिए अर्थात् समान्तर श्रेढ़ी के पदों का योग करने के लिए हम निम्न विधि से सूत्र प्राप्त करते है। 
  • इस सूत्र में उपस्थित राशियों के मान रखकर समान्तर श्रेढी का योग आसानी से ज्ञात किया जा सकेगा।